पुत्रदा एकादशी कब है, पुत्रदा एकादशी महात्म्य

पुत्रदा एकादशी 2019 में कब है क्या है पुत्रदा एकादशी का महत्व औप क्या है पुत्रदा एकादशी की कथा  अगर आप इसके बारे में नहीं जानते हैं तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे। पुत्रदा एकादशी के दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष को पड़ने वाली एकादशी  को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। पुत्रदा एकादशी पर पुत्र रत्न प्राप्त करने के लिए व्रत किया जाता है।

संतान हीनों के लिए यह व्रत काफी लाभदायक है। अगर आप भी पुत्रदा एकादशी का व्रत (Putrada Ekadashi Vrat) रखना चाहते हैं और आपको नहीं पता है कि पुत्रदा एकादशी कब है, क्या है पुत्रदा एकादशी का महत्व  और क्या है पुत्रदा एकादशी की कथा । तो आज हम आपको इसके बारे में बताएंगे तो चलिए जानते हैं पुत्रदा एकादशी की तिथि, महत्व और कथा के बारे में.

पुत्रदा एकादशी का महत्व


शास्त्रों के अनुसार पुत्रदा एकादशी का बड़ा महत्व है। जैसा कि पुत्रदा एकादशी के नाम से ही वर्णित है वैसा ही इसका फल भी है। जो व्यक्ति संतान प्राप्ति के लिए नियम अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है उसे भगवान श्री हरी विष्णु जी का आशीर्वाद प्राप्त होता और उन्हें संतान प्राप्ति का मनोवांछित फल अवश्य मिलता है। पुत्रदा एकादशी के फल के रूप में न केवल संतान की प्राप्ति होती है। बल्कि एक अच्छी और योग्यकारी संतान का जन्म होता है। इस एकादशी के व्रत का इतना महत्व है कि जो भी व्यक्ति पुत्रदा एकादशी का व्रत रखता है। उसकी संतान बहुत ही आज्ञाकारी होती है।


प्राचीन काल में भद्रावती नगर में राजा सुकेतुमान का शासन था। उनकी पत्नी का नाम शैव्या था। सालों बीत जाने के बावजूद संतान नहीं होने के कारण पति-पत्नी दुःखी और चिंतित रहते थे। इसी चिंता में एक दिन राजा सुकेतुमान अपने घोड़े पर सवार होकर वन की ओर चल दिए। घने वन में पहुंचने पर उन्हें प्यास लगी तो पानी की तलाश में वे एक सरोवर के पास पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि सरोवर के पास ऋषियों के आश्रम भी हैं और वहां ऋषि-मुनी वेदपाठ कर रहे हैं। पानी पीने के बाद राजा आश्रम में पहुंचे और ऋषियों को प्रणाम किया।

राजा ने ऋषियों से वहां जुटने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि वे सरोवर के निकट स्नान के लिए आए हैं। उन्होंने बताया कि आज से पांचवें दिन माघ मास का स्नान आरम्भ हो जाएगा और आज पुत्रदा एकादशी है। जो मनुष्य इस दिन व्रत करता है, उन्हें पुत्र की प्राप्ति होती है। इसके बाद राजा अपने राज्य पहुंचे और पुत्रदा एकादशी का व्रत शुरू किया और द्वादशी को पारण किया। व्रत के प्रभाव से कुछ समय के बाद रानी गर्भवती हो गई और उसने एक पुत्र को जन्म दिया। अगर किसी को संतान प्राप्ति में बाधा होती है तो उन्हें इस व्रत को करना चाहिए। व्रत के महात्म्य को सुनने वाले को भी मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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